WTO प्रमुख की चेतावनी: कैसे US टैरिफ वैश्विक व्यापार की नींव हिला रहे हैं

वैश्विक व्यापार का ताना-बाना टूटता हुआ

2 सितंबर, 2025। विश्व व्यापार संगठन (WTO) की महानिदेशक न्गोजी ओकोंजो-इवेला ने एक गंभीर चेतावनी जारी करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा लगाए गए टैरिफ को “पिछले 80 वर्षों में वैश्विक व्यापार नियमों में सबसे बड़ी अव्यवस्था” करार दिया। उन्होंने खुलासा किया कि WTO के नियमों के तहत होने वाले वैश्विक व्यापार का हिस्सा घटकर महज 72% रह गया है, जो एक चिंताजनक संकेत है। यह सिर्फ आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक भूकंपीय बदलाव है जिसके प्रभाव 2026 तक महसूस किए जा सकते हैं। इस ब्लॉग में, हम इस चेतावनी के पीछे की कहानी, इसके वैश्विक निहितार्थ और भारत पर पड़ने वाले संभावित असर को विस्तार से समझेंगे।

टैरिफ का तूफान: वैश्विक व्यापार को झटका

राष्ट्रपति ट्रम्प की aggressive टैरिफ नीति ने वैश्विक व्यापार की बुनियादी संरचना को हिलाकर रख दिया है। WTO का ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN)’ सिद्धांत, जो सभी सदस्य देशों के साथ समान व्यवहार की गारंटी देता है, अब खतरे में नजर आ रहा है। इस सिद्धांत के कमजोर पड़ने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अप्रत्याशितता बढ़ी है और supply chains में खलल पैदा हुई है।

ओकोंजो-इवेला ने जोर देकर कहा कि अगर समय रहते कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो यह गिरावट जारी रह सकती है, जिससे वैश्विक आर्थिक विकास को गंभीर नुकसान होगा। व्यापार की इस अप्रत्याशितता का सीधा असर दुनिया भर के व्यवसायों और उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है।

डेटा पॉइंट: WTO के आंकड़ों के अनुसार, MFN सिद्धांत के तहत होने वाला वैश्विक व्यापार 2019 में 85% था, जो 2025 में घटकर 72% रह गया है। यह एक बड़ी और चिंताजनक गिरावट है।

पिछले कुछ वर्षों में WTO नियमों के तहत वैश्विक व्यापार के हिस्से में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। स्रोत: WTO।

WTO की भविष्यवाणी: 2026 तक रह सकते हैं प्रभाव

WTO प्रमुख ने चेतावनी दी है कि टैरिफ के प्रभाव 2026 तक बने रह सकते हैं। हालाँकि WTO ने हाल ही में वैश्विक व्यापार विकास के अपने पूर्वानुमान को 0.2% से बढ़ाकर 0.9% कर दिया है, लेकिन टैरिफ जारी रहने की स्थिति में इसमें गिरावट आ सकती है।

ओकोंजो-इवेला ने कहा, “अगर टैरिफ का इस्तेमाल भू-राजनीतिक हथियार के तौर पर किया जाता है, तो हमारे पास इसका कोई जवाब नहीं है।” उन्होंने इस चुनौती से निपटने के लिए अनुकूलन (adaptability) की आवश्यकता पर जोर दिया।

डेटा पॉइंट: अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुमान के मुताबिक, सिर्फ चीन पर अमेरिकी टैरिफ से वैश्विक विकास दर में 0.5% की कमी आ सकती है, जिससे emerging economies को सबसे ज्यादा खतरा है।

तालिका: टैरिफ के प्रक्षेपित प्रभाव (2025-2026)

परिदृश्यवैश्विक व्यापार विकास (%)संभावित नुकसान ($ ट्रिलियन)
मौजूदा स्थिति0.9
टैरिफ जारी रहने पर0.52.5
टैरिफ बढ़ने पर-0.25.0

डबल मार: WTO फंडिंग में कटौती

टैरिफ के अलावा, अमेरिका द्वारा WTO के बजट में $29 मिलियन की कटौती का प्रस्ताव इस संकट को और गहरा रहा है। यह कदम WTO की dispute resolution mechanism को कमजोर कर सकता है, जिससे व्यापारिक झगड़ों का निपटारा और मुश्किल हो जाएगा।

ओकोंजो-इवेला ने इस पर चिंता जताई, लेकिन यह भी कहा कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि के साथ इस मुद्दे पर बातचीत जारी है। अतीत में भी अमेरिका के योगदान रोकने से WTO सुधारों में देरी हुई है।

WTO के बजट में विभिन्न देशों की हिस्सेदारी। अमेरिका का योगदान 11% है।

भारत पर प्रभाव: चुनौतियाँ और अवसर

वैश्विक व्यापार में इस उथल-पुथल का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

  • चुनौतियाँ: अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। टैरिफ बढ़ने से भारतीय निर्यातकों को नुकसान हो सकता है। IT, textiles, gems और jewellery जैसे sectors को विशेष चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
  • अवसर: यह संकट भारत के लिए ‘China Plus One’ strategy का फायदा उठाने और अपने निर्यात को diversify करने का एक अवसर भी लेकर आया है। भारत manufacturing hub के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।

आशा की किरण: मत्स्य पालन समझौता

इस उदास माहौल में एक अच्छी खबर यह है कि WTO का मत्स्य पालन सब्सिडी समझौता (fisheries subsidies agreement) लागू होने के very close है। इसे लागू होने के लिए सिर्फ तीन और देशों के ratification की जरूरत है। यह 2017 के बाद WTO का पहला बड़ा वैश्विक समझौता होगा।

यह समझौता overfishing को रोकने और वैश्विक मत्स्य पालन को sustainable बनाने में एक मील का पत्थर साबित होगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

Q1: इस व्यापारिक संकट का मुख्य कारण क्या है?
A1: अमेरिका द्वारा अपने multiple trading partners पर लगाए गए high tariffs इस संकट का मुख्य कारण हैं, जिसने WTO के नियमों को कमजोर किया है।

Q2: क्या इसका प्रभाव 2026 तक रहेगा?
A2: WTO प्रमुख के अनुसार, हाँ। stockpiling के effect खत्म होने के बाद 2026 में इसके वास्तविक प्रभाव और स्पष्ट होंगे।

Q3: भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम क्या है?
A3: अमेरिका के साथ trade war जैसे हालात और निर्यात में गिरावट भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम है, जिससे economic growth slow हो सकती है।

Q4: क्या इस संकट से निपटने की कोई उम्मीद है?
A4: हाँ, WTO सुधारों पर चर्चा जारी है और चीन जैसे देश industrial subsidies पर बातचीत के लिए तैयार हैं, जो एक सकारात्मक संकेत है।

निष्कर्ष

विश्व व्यापार संगठन प्रमुख की यह चेतावनी एक गंभीर खतरे की घंटी है। अमेरिकी टैरिफ नीति ने न केवल वैश्विक व्यापार के नियमों को कमजोर किया है, बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को अनिश्चितता के दौर में धकेल दिया है। भारत के लिए, यह समय सतर्कता और रणनीतिक कूटनीति का है। एक ओर जहाँ अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों को संभालना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर अपने निर्यात और manufacturing base को diversify करने का यह सुनहरा मौका है। वैश्विक व्यापार का भविष्य अब multi-lateral agreements के बजाय bilateral और regional deals की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में, भारत को अपनी foreign policy और trade strategy में लचीलापन बनाए रखते हुए आगे बढ़ना होगा। आने वाला समय वैश्विक आर्थिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है।

आपको क्या लगता है, क्या WTO इस संकट से उबर पाएगा? अपनी राय नीचे कमेंट में लिखें और इस important analysis को अपने connections के साथ जरूर share करें।

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