वैश्विक स्तर पर एक साहसिक रुख
1 सितंबर, 2025। चीन के तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक साहसिक और स्पष्ट रुख अपनाते हुए भारत-रूस ऊर्जा साझेदारी का जोरदार बचाव किया। अमेरिका द्वारा हाल ही में भारतीय सामानों पर 50% अतिरिक्त शुल्क लगाने और रूस पर दबाव बनाने के प्रयासों के बावजूद, मोदी ने इस साझेदारी को ‘स्थिरता का आधार’ बताया। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। यह घोषणा न केवल वैश्विक कूटनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत है, बल्कि भारत की ‘strategic autonomy’ की नीति को भी रेखांकित करती है।
भारत-रूस रिश्तों की मजबूत बुनियाद
भारत और रूस के बीच संबंध दशकों पुराने हैं और यह केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं है। रक्षा, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में दोनों देशों का सहयोग बहुत गहरा है। पिछले कुछ वर्षों में, यूक्रेन संकट के बाद से, रूस से क्रूड ऑयल का आयात भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक प्रमुख हिस्सा बन गया है।
2022 से पहले जहाँ रूस भारत के लिए नगण्य तेल आपूर्तिकर्ता था, वहीं आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। discounted rates पर रूसी तेल मिलने से भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर पा रहा है, बल्कि वैश्विक तेल की कीमतों को स्थिर रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
डेटा पॉइंट: एनर्जी एंड क्लाइमेट इंटेलिजेंस यूनिट (ECIU) के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में भारत ने रूस से प्रतिदिन 1.75 मिलियन बैरल कच्चे तेल का आयात किया, जो उसके कुल आयात का लगभग 35% है। इससे भारत को 2022 के बाद से अनुमानित 17 अरब डॉलर की बचत हुई है।

अमेरिकी प्रतिक्रिया और बढ़ता तनाव
भारत द्वारा रूसी तेल का आयात जारी रखने पर अमेरिका, विशेष रूप से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में, बहुत खुश नहीं है। अमेरिका का मानना है कि यह आयात अप्रत्यक्ष रूप से रूस को यूक्रेन में चल रहे युद्ध के लिए धन उपलब्ध करवा रहा है।
इसी आपत्ति के चलते, अमेरिका ने अगस्त 2025 से भारतीय सामानों पर 50% का अतिरिक्त आयात शुल्क लगा दिया है। इस कदम का सीधा उद्देश्य भारत पर दबाव बनाना है ताकि वह रूसी तेल आयात कम करे। इसने दोनों देशों के संबंधों में एक बड़ी कठिनाई पैदा कर दी है।
डेटा पॉइंट: भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार 2024-25 में $200 अरब के करीब पहुँच गया था। 50% की टैरिफ दर का असर टेक्सटाइल, फार्मा, रसायन और Gems & Jewellery जैसे निर्यात-प्रमुख sectors पर पड़ने की आशंका है।
मोदी की कूटनीति: राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता
प्रधानमंत्री मोदी ने SCO मंच से जो संदेश दिया, वह स्पष्ट और दृढ़ था। उन्होंने कहा, “भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और 1.4 अरब नागरिकों की भलाई को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा।” उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन के साथ अपने संबंधों को “विश्वास और पारस्परिक सम्मान” पर आधारित बताया।
यह रुख भारत की उस foreign policy को दर्शाता है जो ‘multi-alignment’ यानी कई देशों के साथ संतुलित संबंध बनाने में विश्वास रखती है, न कि किसी एक गुट में शामिल होने में। भारत ने अपने फैसले स्वयं लेने के अपने अधिकार पर जोर दिया है।
तालिका: भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी के प्रमुख आयाम (2025)
| क्षेत्र | विवरण |
|---|---|
| ऊर्जा आयात | 1.75 million barrels प्रतिदिन (कुल आयात का ~35%) |
| कुल व्यापार मूल्य | $65 अरब (2025 अनुमान) |
| रक्षा सहयोग | रूस भारत का दूसरा सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता (2020-25 में 36%) |
| रणनीतिक फोकस | ऊर्जा, रक्षा, उर्वरक, परमाणु और अंतरिक्ष सहयोग |
2025 में भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी का विवरण
भविष्य के प्रभाव और आगे की राह
मोदी के इस स्टैंड के दूरगामी प्रभाव होंगे:
- ऊर्जा सुरक्षा: भारत को सस्ता तेल मिलता रहेगा, जिससे महंगाई पर नियंत्रण रखने में मदद मिलेगी।
- व्यापारिक चुनौती: अमेरिका के साथ trade war जैसे हालात बन सकते हैं, जिससे निर्यातक sectors को नुकसान हो सकता है।
- कूटनीतिक संतुलन: भारत को रूस और अमेरिका दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की कठिन चुनौती का सामना करना पड़ेगा।
- वैश्विक गठजोड़: यह घटना एक बहु-ध्रुवीय दुनिया (multi-polar world) के उदय का संकेत देती है, जहाँ अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती मिल रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति पुतिन दिसंबर 2025 में भारत की यात्रा पर आ सकते हैं, जहाँ ऊर्जा और रक्षा से जुड़े नए agreements पर हस्ताक्षर होने की संभावना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: भारत रूस से इतना तेल क्यों खरीद रहा है?
A1: रूस भारत को दुनिया के बाजार भाव से काफी सस्ते दामों पर तेल बेच रहा है। इससे भारत की ऊर्जा लागत कम होती है, जिसका फायदा आम जनता और अर्थव्यवस्था दोनों को होता है।
Q2: अमेरिका भारत पर नाराज क्यों है?
A2: अमेरिका का मानना है कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से रूस को यूक्रेन युद्ध चलाने के लिए पैसा मिल रहा है। वह चाहता है कि भारत रूस पर दबाव बनाने के लिए इस आयात को रोके या कम करे।
Q3: क्या इससे भारत-अमेरिका संबंध हमेशा के लिए खराब हो जाएंगे?
A3: ऐसा नहीं है। दोनों देशों के बीच रणनीतिक हित जुड़े हुए हैं, खासकर Indo-Pacific region में चीन के मुद्दे पर। यह तनाव एक diplomatic challenge है, लेकिन दोनों पक्ष इसे manage करने का प्रयास करेंगे।
Q4: आम भारतीयों पर इसका क्या असर पड़ेगा?
A4: सकारात्मक पक्ष यह है कि पेट्रोल-डीजल की prices कंट्रोल में रह सकती हैं। नकारात्मक पक्ष यह है कि अमेरिका को निर्यात करने वाले उद्योगों (जैसे कपड़ा, गहने) को नुकसान हो सकता है, जिससे jobs पर असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
1 सितंबर, 2025 का दिन भारतीय विदेश नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में याद किया जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस दृढ़ता के साष अमेरिकी दबाव के आगे झुकने से इनकार किया और अपनी ऊर्जा सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी, उसने दुनिया को भारत की ‘strategic autonomy’ की ताकत का एहसास कराया। भारत अब वह देश नहीं रहा जो global powers के इशारों पर चले। उसने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए ही वैश्विक मामलों में भागीदारी करेगा। आने वाला समय भारतीय कूटनीति की कसौटी होगी, जहाँ उसे रूस जैसे पुराने मित्र और अमेरिका जैसे रणनीतिक साझेदार, दोनों के साथ संतुलन बनाकर चलना होगा।
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