मुंबई बंधक कांड: ₹2 करोड़ की बकाया राशि के लिए ‘शांत और संयमी’ रोहित आर्या की आख़िरी जंग, जो बन गई त्रासदी

मुंबई में गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025 को जो हुआ, उसने पूरे शहर को हिला दिया। 50 वर्षीय रोहित आर्या ने पवई के महावीर क्लासिक बिल्डिंग में स्थित RA स्टूडियो में 17 बच्चों को बंधक बना लिया और 3.5 घंटे चली तनावपूर्ण मुठभेड़ के बाद पुलिस की गोली से मारे गए। जो शुरुआत में एक “ऑडिशन कॉल” लग रही थी, वह दरअसल ₹2 करोड़ की सरकारी बकाया राशि की मांग से जुड़ी एक हताश पुकार बन गई। उनकी पत्नी अंजलि आर्या ने बताया कि यह सब आर्थिक तंगी और अन्याय के कारण हुआ। वहीं पड़ोसी और परिचित उन्हें एक “शांत और संयमी व्यक्ति” के रूप में याद कर रहे हैं।

अगर आप रोहित आर्या मुंबई घटना या पवई स्टूडियो बंधक मामला 2025 की पूरी कहानी जानना चाहते हैं, तो यहाँ विस्तार से जानिए कि कैसे एक प्रोजेक्ट की बकाया रकम ने एक सामान्य व्यक्ति की ज़िंदगी बदल दी।

पवई की भयावह दोपहर: मिनट-दर-मिनट घटनाक्रम

गुरुवार दोपहर करीब 12 बजे, रोहित आर्या ने “ऑडिशन” के नाम पर बच्चों को स्टूडियो बुलाया और भीतर से दरवाज़े बंद कर लिए। उनके पास एक एयर गन और ज्वलनशील स्प्रे था।

घटनाक्रम इस प्रकार रहा:

समयमुख्य घटना
~12:00 PM17 बच्चे ‘ऑडिशन’ के लिए पहुंचे; आर्या ने स्टूडियो बंद किया।
~1:00 PMपुलिस ने महावीर क्लासिक बिल्डिंग को घेरा। बातचीत शुरू।
~2:30 PMआर्या ने वीडियो जारी किया — कहा, “मेरी मांगें नैतिक हैं, मैं आतंकवादी नहीं हूँ।”
~3:30 PMकुछ बच्चों को छोड़ा गया; तनाव चरम पर पहुँचा।
~3:35 PMपुलिस ने धावा बोला, सभी बच्चे सुरक्षित; आर्या घायल हुए और अस्पताल पहुँचने से पहले मृत्यु हो गई।

वीडियो में रोहित ने कहा था —

“मेरी मांगें नैतिक और न्यायसंगत हैं। मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मेरे पास कोई अवैध हथियार नहीं, सिर्फ़ न्याय की मांग है।”

मुंबई पुलिस ने बाद में पुष्टि की कि सभी 17 बच्चे सुरक्षित हैं। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने शहर और देश में मानसिक स्वास्थ्य और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए।

‘हमेशा शांत रहने वाले व्यक्ति’ की कहानी: परिचितों की यादें

अंजलि आर्या ने मीडिया को बताया —

“वह PLC स्वच्छता मॉनिटर प्रोजेक्ट के प्रमुख थे। मंत्री केसारकर साहब ने ₹2 करोड़ स्वीकृत करने की बात कही थी। काम पूरा हुआ लेकिन न भुगतान मिला, न सम्मान।”

रोहित पहले पुणे में Jelly’s Café चलाते थे, लेकिन कर्ज़ और घाटे के कारण बंद करना पड़ा। इसके बाद वे मुंबई में काम तलाशने आए।

पड़ोसी और दुकानदारों ने कहा —

  • “वह हमेशा नम्र और संयमी थे, कभी गुस्सा करते नहीं देखा।”
  • “कभी-कभी कहते थे कि मुंबई में प्रोजेक्ट को लेकर परेशानी है।”
  • “ऐसा कदम उठाएंगे, ये किसी ने नहीं सोचा था।”

उनकी पुरानी पहचान और अंतिम कार्य के बीच का यह विरोधाभास, एक व्यक्ति की टूटती मानसिक स्थिति का दर्पण बन गया।

₹2 करोड़ का विवाद: सरकारी प्रोजेक्ट और अधूरी उम्मीदें

रोहित का दावा था कि उन्होंने महाराष्ट्र सरकार की ‘माझी शाळा, सुंदर शाळा’ योजना के तहत PLC स्वच्छता मॉनिटर प्रोजेक्ट पूरा किया था। उस पर ₹2 करोड़ का भुगतान बकाया था।

उनकी पत्नी ने बताया कि उन्होंने 2024 में कई बार शिक्षा विभाग और मंत्री दीपक केसारकर से संपर्क किया, यहाँ तक कि आज़ाद मैदान और मंत्री आवास के बाहर भी विरोध प्रदर्शन किया, पर समाधान नहीं मिला।

पूर्व मंत्री केसारकर ने कहा —

“मैंने उनसे एक पायलट प्रोजेक्ट करवाया था और व्यक्तिगत रूप से कुछ राशि भी दी थी। विभाग पर कोई बकाया नहीं है।”

यह विवाद सरकारी परियोजनाओं में भुगतान देरी के गहरे संकट को उजागर करता है, जहाँ ठेकेदारों और फ्रीलांसरों को महीनों तक भुगतान नहीं मिलता।

मानसिक दबाव, पुलिस कार्रवाई और समाज की प्रतिक्रिया

इस घटना ने एक बड़ी बहस छेड़ दी — क्या मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी ऐसी त्रासदियों को जन्म देती है?
मुंबई पुलिस की त्वरित कार्रवाई ने सभी बच्चों को बचा लिया, पर सवाल यह है कि क्या बातचीत और देर तक चल सकती थी?

देशभर में ऐसे कई ठेकेदार और कर्मचारी हैं जो बकाया भुगतान के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। रोहित की कहानी उस वर्ग की आवाज़ बन गई है जो वर्षों से उपेक्षित है।

सबक: त्रासदी से पहले संवाद

17 परिवार आज राहत की सांस ले रहे हैं, लेकिन एक परिवार हमेशा के लिए टूट गया।
“शांत और संयमी” रोहित आर्या अब नहीं हैं, पर उनका संदेश गूंज रहा है —

“जब सिस्टम सुनना बंद कर देता है, तब कोई भी व्यक्ति टूट सकता है।”

क्या समय पर भुगतान और सहानुभूतिपूर्ण संवाद इस घटना को रोक सकता था?
आपकी राय नीचे कमेंट में बताइए।
मुंबई समाचार, मानसिक स्वास्थ्य और सरकारी जवाबदेही पर आगे की कहानियों के लिए जुड़े रहिए।

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